Monday, October 2, 2017

खलता है

                     .......... खलता है ..........

   कुछ खलता है मुझको
   वो भीड़ मे मुझको किनारा कर देना
   अपनो कि महफ़िल मे बेगाना कर देना
   कुछ खलता है मुझको....

   रट लगाये रहती थी
   जो मेरे ही नाम कि..
   आज उसका दिनभर मे.
   एक बार भी नाम ना लेना
   कुछ खलता है मुझको....

    छोटी बड़ी खुशियों मे
    कभि मैं साझेदार था।
    उन मीठी नादानियों... शैतानियों में 
    बराबर का हिस्सेदार था।
    उनके जाने कि खब़र का
    ग़ैरो से मिलना..
    कुछ खलता है मुझको....

    बात बात पर लड़ना झगड़ना
    आदत में शुमार था..
    आज हमसे खफ़ा होकर
    यूँ चुप्पी साध लेना
    कुछ खलता है मुझको....

    सालों बाद आज मुलाकात हुयी
    एकटक एक दूजे को देखते जाना...
    मेरा उनसे हाल पूछने पर
    वापस जवाब ना आना
    कुछ खलता है मुझको....

    उसके चेहरे का नूर .. कहीं गायब था ।
    वो मेरा जोर देने पर..
    उसका टूट कर बिखर जाना
    कुछ खलता है मुझको....

    छत पर चोरी छिपे मिलने जाना
    सर्दियों में रेबड़ी और मूँगफली संग
    अपने अपने दिल का हाल सुनाना
    उस प्यार को उन छज्जों पर..
    छोड़ आना मेरा
    बहुत खलता है मुझको..
   
    कुछ खलता है मुझको....
    कुछ खलता है मुझको....


           © विदा देना - अभि©


Tuesday, June 27, 2017

गुज़रता वक्त..

                  ...... गुज़रता वक्त......

   समय तो गुजरता ही रहता है....
   अपनी ग़ती से.
   इंसान कहीं पीछे छूट जाते हैं।

    वक्त गर रुकता कभी किसी के लिये
    तो शायद कभी बढ़ ना पाता.
    वो जो होना है भविष्य में
    वो कहीं कभी घट ना पाता।

    ईश्वर कि इच्छाएँ भी.. तमाम फेल हो जाती
    क्या भरोसा कितनी माँऐ..
    फिर उन्हें मनाती।

    और कभि बैठे हुए याद..आ ही जाती है
     ये कम्बख्त कितना रूलाती है
     अतीत के गलियारों से आ कर..
     बेवजह आज को.. हिला जाती है।
      
     फिर सोचते हैं कि चीजें
     कितनी जल्दी बदल गयीं....
     माँ कहने वाली जुबां
     कब मौम मे बदल गयी।
    
     माँ  भी  तो  कितनि बदली 
     दिखाई पड़ती है...
     अब ढूंढे से वो आँचल नहीं मिलता
     जिसकी छॉव मे कभि सो जाते थे..
     कभी रोये जो लिपट कर उससे
     आँचल में वो आँसू पिरोये जाते थे।

    दोश किसी का नहीं.. किससे कहें भी जाके
    कोई फायदा नहीं इन बातों का अब...
    वक्त बदलना होता है 
    और बदलाव माँगता है...
    पुराने रिश्ते जिन्दा रखने के लिए
    नये हिसाब माँगता है....

    पुराने रिश्ते जिन्दा रखने के लिए
    नये हिसाब माँगता है....

             ©  विदा देना - अभि ©

Sunday, February 12, 2017

Sapoot

...................... सपूत ........................

माँ भारती तेरे सपूतो को सलाम करता हूँ...
चंद पंक्तिया जो चले गये..उनके नाम करता हूँ.

काश वो बात हर रो़ज की...आखिरी ना होती..
खबर मिली घर पर कि तू चला गया...
माँ बिलख के ना रोती...

और सब सही चल रहा था...
आर्मी मे रहकर मन्दिर की रक्षा कर रहा था..
काश चंद रोज़ पहले तबादला ना होता..
तू भी कहीं मेरे आस पास होता..

बड़ी खुशी से दी थी विदाई तुझको..
क्या पता था कि ना देगा अब दिखाई मुझको..

मन की करता था बस अपनी...
मैं कहती थी बाबू कि नौकरी कर ले...
डाक्टरी , इन्जिनियरी, कोई शांत काम कर ले..
तू ठान के बैठा था कि आर्मी मे जाऊँगा....
शर्मा ,वर्मा ,मिश्रा .... सब से सल्यूट कराऊँगा..

अब तो वो दिन इक बुरा सपना सा लगता है....
ना हारी होती तेरी ज़िद के आगे...
शायद यहीं लेटा होता पाँव फैला के...

देश भक्ती का जज्बा भी अच्छा था..
भारत माँ की रक्षा करूँगा इरादा सच्चा था..
भारत माँ के तो तमाम सहारे थे..
क्या लगे ...हमारे रिश्ते खारे थे.....

अब सोचती हूँ कि तेरी इच्छा ने 
जन्म ना लिया होता...
वो देश पे मरने का जुनून...पलने ना दिया होता

तू ले ही गया जो चाहता था...
आखिरी इच्छा अपनी ...बचपन से ही गाता था
मिल गयी दिल को तस्ल्ली..
हमें जिन्दगी भर का ग़म देके...

माँ भटकती है सड़को पर..
तेरा नाम ले लेके...
क्या पा गया दुनिया से जाते..जाते..
इक्कीस तोपों की सलामी लेके....

इक्कीस तोपों की सलामी लेके....

        विदा देना ©अभि©

Saturday, January 7, 2017

Kucch Kadam....

    .......... कुछ कदम ..........

     उँगलीयो से थाम उँगलिया...
     हाथों मे बंद अहसास 
     चलो कुछ बीती बातें याद करते हैं 
     कुछ कदम फिर से साथ  चलते हैं

     कुछ अलग सा अहसास कह लो...
     या अज़नबी खा़मोशी
     तोड़ने को ये सिलसिला
     पहल आज करते हैं
     चलो कुछ कद़म फिर साथ चलते हैं

     मेरे गिरने पर तुम्हारा खिलखिलाना...
     खुद तो मेरा सहारा ले ....संभल जाना
     कई ऐसे किस्सो को दो चार करते हैं
     कुछ कद़म फिर साथ चलते हैं
    
     बचपन की वो डाँट डपट...
     वो खींचातानी मिठी सी....
     पैप्सी , पारले , नटखट... झगड़ा इनपर
     फिर एक बार करते हैं
     चल कुछ कद़म फिर साथ चलते हैं

     कितना दूर निकल आये...
     हम कुछ कदम चलते चलते.....
     अब पीछे को रूख़ यार
     इक साथ करते हैं
     चलो कुछ कद़म फिर साथ चलते हैं
     चल कुछ कद़म फिर साथ चलते हैं ।

            विदा देना ©अभि©