.................. स्वाविलंबन................
ना झुकुंगा , ना गिरूँगा , ना रूकुंगा........
ना ही हाथ फैलाऊंगा माँ.......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
रास्ते अंधेरे भले हो चाहे....
उस रौशनी की चाह मे.. मै बढ़ता जाऊँगा माँ..
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
ज़माना और हालात....
चाहे कितना भी मजबूर करे...
तेरी सीख... कभि ना भुलाउन्गा माँ......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
कैसे भूल सकता हूँ मै.....
वो आखिरी निवाला तेरा ,
जो अक्सर मेरा हो जाया करता था...
उस कौर का स्वाद ...मै कैसे भुलाउन्गा माँ...
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
उस चूल्हे मे जो तपा...
वो लकड़ी नहीं जीवन था तेरा..
तेरे संघर्षो पर ..ना कभि आँच लाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
जब सोचता हूँ तेरी बातों को...
जीवन का निचोड़ पाता हूँ.....
मेरे डर पर ....तेरे विश्वास का पड़ला..
हरबार कुछ भारी पाता हूँ.........
जो मेरे सीने मे जलाये रखी बरसों तक..
स्वाविलंबन कि वो अग्नि....
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....
विदा देना © अभि ©
awesome bhai 😊
ReplyDeleteThanks bhai
DeleteNice🌹🌹
ReplyDeleteNice🌹🌹
ReplyDeleteAwesome bro.
ReplyDeleteNice lines.
RydeR
Thanks bro
DeleteAwesome bro.
ReplyDeleteNice lines.
RydeR