Friday, October 7, 2016

Sambhalna....Fir Se...

.........संभलना - फिर से............

उस पुराने बस्ते से.. मेरी किताबें झाँकती थी...
पैन्सिल और रबड़...इस कोने से उस कोने
भाग़ती थीं ....
मेरे मन का डब्बा..लन्च का इंतजार करता था.
यूँ अचानक छूटा मेरे हाथों से....
वो बस्ता कुछ भारी था शायद...
मै संभाल नही पाया....


नन्हे कदमो का यूँ बढ़ जाना..
वो वाक़र पर चलते चलते..कब साइकिल पे चढ़ जाना...
द्सवीं की परिक्षा का इनाम मोटर साइकिल था
उन शुरूआती .....शुरूआती अपेक्षाओं का...
उन काँधो पे दवाब .....
मै संभाल नही पाया....


सुबह सुबह पंक्षियो का चहकना...
बेफ़िक्र परिंदो का उड़ना खुले आसमान के नीचे...
आज़ाद गगन मे साँसे लेना....
वो उनका वापस आ जाना इक सीटी के 
बुलावे पर....
 घर की अटरिया पर वो दरब़ा......
मै संभाल नही पाया....


अपनी शर्तों पर जीनी थी ज़िन्दगी हमें .....
 ये अमूम़न गुरूर रहा होगा.....
 हालात जब शर्तें गिनाने पे आऐ....
 मै संभाल नही पाया....
 मै संभाल नही पाया....

              विदा देना © अभि ©
                                               समाप्त।

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