मौहलत...
जिन्दगी जो कल छोड़ के मुझे जायेगीतो मौहलत देगी क्या ?
कुछ कह सकूँ मैं अपनो से
जो हर रोज कि भागदौड़ मे
शायद कहीं छूट जाता है ।
वो फोन जो अब बजेगा नहीं
दोनों तरफ से...
आखिरी चंद सैकंड कि बात
को मौहलत देगी क्या ।
वो जो दफ्तर मेरा...मेरी मेज़
जो सजी पडी है
मेरे ही सामान से
उसे बटोरने कि
मौहलत देगी क्या ।
जो सपने अपने.. अभि देखने
शुरू ही तो किये थे
उन्हें पूरे करने की
मौहलत देगी क्या ।
वो जो कमरा मेरा
पूँछेगा तुझसे कि कहाँ हूँ मैं
तो क्या जवाब देगी ?
मेरे घर का हर हिस्सा
जब ढूंढेगा मुझे
हर आहट पे...यूँ..
चौखट पर निगाह रख के
तो क्या कहेगी ?
ऐक बार घर के हर हिस्से को
उसमे कैद तमाम किस्सो को
खुद में समेटने की
मौहलत देगी क्या ?
जिन्दगी जो कल छोड़ के मुझे जायेगी
तो मौहलत देगी क्या ?
विदा देना ©अभि©
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