Thursday, June 7, 2018

Kasmakash

                          ... कशमकश ...

    कुछ किस्से हैं कुछ बातें हैं
    कुछ तेरे हैं... कुछ मेरे हैं
    कुछ अपने हैं कुछ अभि भी सपने हैं
    कुछ किस्से हैं कुछ बातें हैं

    चिलचिलाती धूप मे
    रुकती नहीं कभी तू
    आवाज मेरी सुनती तो है
    पर मुड़ती नहीं कभी तू ।

    नाराजगी तेरी जायज तो है
    पिछले इतवार की तरह
    मैं इस हफ्ते भी जो तुझे
    समय ना दे सका 
    हर बार की तरह

    पर जानता हूँ.. 
    कि मना लूँगा तुम्हें
    कुछ प्यार भरे शब्द जब बोलूंगा
    जिम्मेदारी के तराजू मे
    रख पावो भर दिल जब तोलूँगा ।

    कुछ परेशान सी लगी मुझे
    वो डबडबायी आँखें तेरी
    ना जाने कितने सवाल
    उस मायूस चेहरे पर थे

    देखता रहा बस दूर से
    पास आने कि हिम्मत ना हुई
    हर बार की तरह

    कुछ किस्से हैं कुछ बातें हैं
    कुछ तेरे हैं... कुछ मेरे हैं
    कुछ अपने हैं कुछ अभि भी सपने हैं
    कुछ किस्से हैं ...
    कुछ बातें हैं....

                      विदा देना © अभि ©
   
   

Wednesday, March 21, 2018

मौहलत

                                  मौहलत...

     जिन्दगी जो कल छोड़ के मुझे जायेगी
     तो मौहलत देगी क्या ?

     कुछ कह सकूँ मैं अपनो से
     जो हर रोज कि भागदौड़ मे
     शायद कहीं छूट जाता है ।

     वो फोन जो अब बजेगा नहीं
     दोनों तरफ से...
     आखिरी चंद सैकंड कि बात
     को मौहलत देगी क्या ।
    
     वो जो दफ्तर मेरा...मेरी मेज़
     जो सजी पडी है
     मेरे ही सामान से
     उसे बटोरने कि
     मौहलत देगी क्या ।
      
     जो सपने अपने.. अभि देखने
     शुरू ही तो किये थे
     उन्हें पूरे करने की
     मौहलत देगी क्या ।

     वो जो कमरा मेरा
     पूँछेगा तुझसे कि कहाँ हूँ मैं
     तो क्या जवाब देगी ?

     मेरे घर का हर हिस्सा 
     जब ढूंढेगा मुझे
     हर आहट पे...यूँ..
     चौखट पर निगाह रख के
     तो क्या कहेगी ?

     ऐक बार घर के हर हिस्से को
     उसमे कैद तमाम किस्सो को
     खुद में समेटने की
     मौहलत देगी क्या ?

     जिन्दगी जो कल छोड़ के मुझे जायेगी
     तो मौहलत देगी क्या ?

                                      विदा देना ©अभि©