Saturday, October 15, 2016

Swavilamban..



..................   स्वाविलंबन................

ना झुकुंगा , ना गिरूँगा , ना रूकुंगा........
ना ही हाथ फैलाऊंगा माँ.......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

रास्ते अंधेरे भले हो चाहे....
उस रौशनी की चाह मे.. मै बढ़ता जाऊँगा माँ..
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

ज़माना और हालात....
चाहे कितना भी मजबूर करे...
तेरी सीख... कभि ना भुलाउन्गा माँ......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

कैसे भूल सकता हूँ मै.....
वो आखिरी निवाला तेरा ,
 जो अक्सर मेरा हो जाया करता था...
उस कौर का स्वाद ...मै कैसे भुलाउन्गा माँ...
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

उस चूल्हे मे जो तपा...
वो लकड़ी नहीं जीवन था तेरा..
तेरे संघर्षो पर ..ना कभि आँच लाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

जब सोचता हूँ  तेरी बातों को...
जीवन का निचोड़ पाता हूँ.....
मेरे डर पर ....तेरे विश्वास का पड़ला..
हरबार कुछ भारी पाता हूँ.........

जो मेरे सीने मे जलाये रखी बरसों तक..
स्वाविलंबन कि वो अग्नि.... 
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

             विदा देना © अभि ©

Friday, October 7, 2016

Sambhalna....Fir Se...

.........संभलना - फिर से............

उस पुराने बस्ते से.. मेरी किताबें झाँकती थी...
पैन्सिल और रबड़...इस कोने से उस कोने
भाग़ती थीं ....
मेरे मन का डब्बा..लन्च का इंतजार करता था.
यूँ अचानक छूटा मेरे हाथों से....
वो बस्ता कुछ भारी था शायद...
मै संभाल नही पाया....


नन्हे कदमो का यूँ बढ़ जाना..
वो वाक़र पर चलते चलते..कब साइकिल पे चढ़ जाना...
द्सवीं की परिक्षा का इनाम मोटर साइकिल था
उन शुरूआती .....शुरूआती अपेक्षाओं का...
उन काँधो पे दवाब .....
मै संभाल नही पाया....


सुबह सुबह पंक्षियो का चहकना...
बेफ़िक्र परिंदो का उड़ना खुले आसमान के नीचे...
आज़ाद गगन मे साँसे लेना....
वो उनका वापस आ जाना इक सीटी के 
बुलावे पर....
 घर की अटरिया पर वो दरब़ा......
मै संभाल नही पाया....


अपनी शर्तों पर जीनी थी ज़िन्दगी हमें .....
 ये अमूम़न गुरूर रहा होगा.....
 हालात जब शर्तें गिनाने पे आऐ....
 मै संभाल नही पाया....
 मै संभाल नही पाया....

              विदा देना © अभि ©
                                               समाप्त।