Thursday, December 8, 2016

Ae Jindagi.....

.............. ऐ ज़िन्दगी .............

    ज़िन्दगी कभी तो ठहरेगी तू भी...
    तभी सारा हिसाब कर लेंगे .
    कुछ पल जो ससतायेगी ...
    उम्र के पढ़ावो मे.
    तभी पिछला हिसाब कर लेंगे
    ज़िन्दगी कभी तो ठहरेगी तू भी...
  
    चल पड़ता हूँ अंजान राहों पे..
    मन का मोर जहाँ ले जाये..
    थिरक लेता हूँ कभि..
    कभि अपनी , कभी गै़रो कि धुनो पर..

     ससताने के ख़याल को टाल जाता हूँ.
     सोच कर ....के तेरा साथ निभाता हूँ..
     ज़िन्दगी कभी तो ठहरेगी तू भी...
     तभी साथ मे आराम कर लेंगे.....
     ज़िन्दगी कभी जो ठहरेगी तू भी...

     जीवन में कोई मलाल ना हो.
     जो पैदा करे घुटन.. ऐसा सवाल ना हो...
     घुट घुट के जीना भी कहाँ जीना है....
     पीने को तो पी लेंगे....
     गर नियती में ही जहर पीना है...
     नियती को बदलने का प्रयास कर लेंगे...
     तुझसे और द़ो चार सवाल कर लेंगे...
     ज़िन्दगी कभी तो ठहरेगी तू भी..
     ज़िन्दगी कभी जो ठहरेगी तू भी.....

     मेरी रफ्त़ार मे अब कुछ कम़ी है...
     साथ छोड़ दिया है सब ने
     बस इस बात की ग़मी है....
     ज़िन्दगी अब समझ आया, 
     तेरे चलने का राज़....
     तेरे चलने से ही.. मेरे जीवन में गत़ी है...
     ये ख्व़ाब लगता है अधूरा रह जायेगा.
     जिन्दगी जो थमी तो कहाँ जीवन रह जायेगा
     जिन्दगी जो थमी तो कहाँ जीवन रह जायेगा....
   
    सब बातें भ्रम सी रहीं फिर......
    गुफ्तगू तेरे साथ कर लेंगे
    तुझसे नये दो चार सवाल कर लेंगे....
    ज़िन्दगी कभी जो ठहरेगी तू भी...
    ज़िन्दगी कभी जो ठहरेगी तू भी.......

             विदा देना © अभि©

Tuesday, November 8, 2016

WAQT......जो कभी रूकता नहीं

              ................. वक्त  ..................

   मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
   मेरे घर के उस कोने को ,
   जो उदास सा बैठा है...
   कुछ देर एकटक देखना चाहता हूँ ....
   मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..

   मेहसूस कर सकता हूँ .. उस खालीपन को..
   वो जो उठता है अंदर से...
   कर बेचैन मन को...
   वो सन्नाटे में भी ....जुगनुओं की.....हूँ हूँ...
   सुनना चाहता हूँ.......
  मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..

  क्यूँ अजनबी से.... ये दरोदिवार लगते हैं...
  क्यूँ पूछते हैं पता हरबार मुझ से....
  इस बार..... मैं कई बार का हिसाब
  देना चाहता हूँ....
  मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
    
  ये गलियाँ अब मुझे नहीं पहचानती....
  मैं कितनी भी दल़ीले दूँ...
  ये अब नहीं मानती......
  इन्हें भी अपनी आहटों से....
  फिर से मिलाना चाहता हूँ.....
  मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..

  फिक्रमंद बनता हूँ काफी....
  बोलने से पहले.. अपने ही शब्दो को तोलना
  चाहता हूँ...
  जो सवाल आज उठे हैं...
  उन्हें कल पर छोड़ना चाहता हूँ...
  मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..

   मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..

               विदा देना © अभि ©

Saturday, October 15, 2016

Swavilamban..



..................   स्वाविलंबन................

ना झुकुंगा , ना गिरूँगा , ना रूकुंगा........
ना ही हाथ फैलाऊंगा माँ.......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

रास्ते अंधेरे भले हो चाहे....
उस रौशनी की चाह मे.. मै बढ़ता जाऊँगा माँ..
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

ज़माना और हालात....
चाहे कितना भी मजबूर करे...
तेरी सीख... कभि ना भुलाउन्गा माँ......
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

कैसे भूल सकता हूँ मै.....
वो आखिरी निवाला तेरा ,
 जो अक्सर मेरा हो जाया करता था...
उस कौर का स्वाद ...मै कैसे भुलाउन्गा माँ...
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

उस चूल्हे मे जो तपा...
वो लकड़ी नहीं जीवन था तेरा..
तेरे संघर्षो पर ..ना कभि आँच लाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

जब सोचता हूँ  तेरी बातों को...
जीवन का निचोड़ पाता हूँ.....
मेरे डर पर ....तेरे विश्वास का पड़ला..
हरबार कुछ भारी पाता हूँ.........

जो मेरे सीने मे जलाये रखी बरसों तक..
स्वाविलंबन कि वो अग्नि.... 
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाऊँगा माँ.....
मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

मै अपनी रोटी खुद ही खाऊँगा माँ.....

             विदा देना © अभि ©

Friday, October 7, 2016

Sambhalna....Fir Se...

.........संभलना - फिर से............

उस पुराने बस्ते से.. मेरी किताबें झाँकती थी...
पैन्सिल और रबड़...इस कोने से उस कोने
भाग़ती थीं ....
मेरे मन का डब्बा..लन्च का इंतजार करता था.
यूँ अचानक छूटा मेरे हाथों से....
वो बस्ता कुछ भारी था शायद...
मै संभाल नही पाया....


नन्हे कदमो का यूँ बढ़ जाना..
वो वाक़र पर चलते चलते..कब साइकिल पे चढ़ जाना...
द्सवीं की परिक्षा का इनाम मोटर साइकिल था
उन शुरूआती .....शुरूआती अपेक्षाओं का...
उन काँधो पे दवाब .....
मै संभाल नही पाया....


सुबह सुबह पंक्षियो का चहकना...
बेफ़िक्र परिंदो का उड़ना खुले आसमान के नीचे...
आज़ाद गगन मे साँसे लेना....
वो उनका वापस आ जाना इक सीटी के 
बुलावे पर....
 घर की अटरिया पर वो दरब़ा......
मै संभाल नही पाया....


अपनी शर्तों पर जीनी थी ज़िन्दगी हमें .....
 ये अमूम़न गुरूर रहा होगा.....
 हालात जब शर्तें गिनाने पे आऐ....
 मै संभाल नही पाया....
 मै संभाल नही पाया....

              विदा देना © अभि ©
                                               समाप्त।

Thursday, September 29, 2016

Sambhalna.....a cautious step...

...............संभलना...............

मै संभाल नही पाया...
बचपन मे ..टाफियां और सिक्के
वो जो घर से मिले थे ....
जेबों मे भरे हुये कंचे
मै संभाल नही पाया....


वो चहकती गलियां...जो गूंजती थी 
मेरे जैसे कितनो के शोरगुल से....
उनकी ये खा़मोशी....सूनापन...
मै संभाल नही पाया....


वो साथ मे बढना किसी के...
गुजा़री हो दिन रा़त साथ उन्ही के...
वो उस शाम को ...उनका ना लौटना ..
मै संभाल नही पाया....


जिंदगी के कई रंग देखे...
होली मे नाचते .... झूमते...पिये भंग देखे..
वो उस दिन यूं..  बेरंग देख उन्हे...
मै संभाल नही पाया....


बीते प़लो का यूँ  यादें बन जाना..
कुछ खटृी ..कुछ मीठी..इक कोने मे बस जाना
कुछ लोग खडे थे साथ मेरे....लेकिन उन्हे ....
मै संभाल नही पाया....
               
          बिदा देना © अभि ©
                                       ....जारी रहेगा.....
         

Saturday, September 24, 2016

....Kaun Hai....Short Poem cum Poetry...

       ....................Kaun Hai................

Mere khwabon pe koi dastak de rha hai....kaun haii.....
Anjana sa ...ajnabi  sa.... kuch dhundhla sa saya hai....
kaun haiiii.......
Roj aata hai ussi waqt....bada paband hai...parr   Kaun haiiiii..
 Iss kashmakash mei kitni raaten nikal dii.....
Karvaten idhar se udhar naa jaane kitni baar li.......Kaun haiii...
 Neem hakeem kahan 2 nahi  ghuma... Pata nahi kitne mandir ...kitne gurudware.... kahan 2
 dar ko chuma...
  Par Kaun haii...
 Mera Khayal he nikla jo mere he  khwabon se baaten krta rha..
Aur mei Puchta raha ki Kaun hai..
Kaun hai ......!!! 
Signing Off ©abhii©

Friday, September 23, 2016

Blogg Revival

Nostalgic......To see a blog owned by me...
Don't even remember when I created it, Maybe trying my hands in a lot of things at that time.
It would have surely come out of ZEAL at that time.
Its time to revive it now....:)