................. वक्त ..................
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मेरे घर के उस कोने को ,
जो उदास सा बैठा है...
कुछ देर एकटक देखना चाहता हूँ ....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मेहसूस कर सकता हूँ .. उस खालीपन को..
वो जो उठता है अंदर से...
कर बेचैन मन को...
वो सन्नाटे में भी ....जुगनुओं की.....हूँ हूँ...
सुनना चाहता हूँ.......
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
क्यूँ अजनबी से.... ये दरोदिवार लगते हैं...
क्यूँ पूछते हैं पता हरबार मुझ से....
इस बार..... मैं कई बार का हिसाब
देना चाहता हूँ....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
ये गलियाँ अब मुझे नहीं पहचानती....
मैं कितनी भी दल़ीले दूँ...
ये अब नहीं मानती......
इन्हें भी अपनी आहटों से....
फिर से मिलाना चाहता हूँ.....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
फिक्रमंद बनता हूँ काफी....
बोलने से पहले.. अपने ही शब्दो को तोलना
चाहता हूँ...
जो सवाल आज उठे हैं...
उन्हें कल पर छोड़ना चाहता हूँ...
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
विदा देना © अभि ©
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मेरे घर के उस कोने को ,
जो उदास सा बैठा है...
कुछ देर एकटक देखना चाहता हूँ ....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मेहसूस कर सकता हूँ .. उस खालीपन को..
वो जो उठता है अंदर से...
कर बेचैन मन को...
वो सन्नाटे में भी ....जुगनुओं की.....हूँ हूँ...
सुनना चाहता हूँ.......
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
क्यूँ अजनबी से.... ये दरोदिवार लगते हैं...
क्यूँ पूछते हैं पता हरबार मुझ से....
इस बार..... मैं कई बार का हिसाब
देना चाहता हूँ....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
ये गलियाँ अब मुझे नहीं पहचानती....
मैं कितनी भी दल़ीले दूँ...
ये अब नहीं मानती......
इन्हें भी अपनी आहटों से....
फिर से मिलाना चाहता हूँ.....
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
फिक्रमंद बनता हूँ काफी....
बोलने से पहले.. अपने ही शब्दो को तोलना
चाहता हूँ...
जो सवाल आज उठे हैं...
उन्हें कल पर छोड़ना चाहता हूँ...
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
मैं वक्त को थोड़ा सा वक्त देना चाहता हूँ..
विदा देना © अभि ©